The Terrifying 1923 Great Kanto Earthquake That Radicalized Early 20th-Century Japanese Society

प्राकृतिक आपदाएँ अक्सर केवल शहरों की इमारतों को ही नहीं गिरातीं, बल्कि वे किसी राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने, उसकी राजनीति और उसकी वैचारिक दिशा को भी जड़ से हिला देती हैं। 20वीं सदी की शुरुआत में एशिया की उभरती हुई महाशक्ति—जापान (Japan)—ने एक ऐसी ही प्रलय का सामना किया था।

1 सितंबर 1923 को जापान के कांटो क्षेत्र (Kanto Region), जिसमें टोक्यो (Tokyo) और योकोहामा (Yokohama) जैसे घनी आबादी वाले शहर शामिल थे, में एक अत्यंत विनाशकारी भूकंप आया। इसे इतिहास में ‘ग्रेट कांटो भूकंप’ (The Great Kanto Earthquake) के नाम से जाना जाता है। 7.9 तीव्रता के इस भूकंप और उसके बाद भड़की बेकाबू आग ने न केवल 1,40,000 से अधिक लोगों की जान ली, बल्कि यह जापानी इतिहास का वह निर्णायक मोड़ (Turning Point) साबित हुआ जिसने देश की दिशा ही बदल दी।

विद्यार्थियों, इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों के लिए इस घटना का अध्ययन इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल भूविज्ञान (Geology) की त्रासदी नहीं थी। इसी भूकंप की राख से उस उग्र राष्ट्रवाद (Ultranationalism), अफवाहों पर आधारित क्रूर नरसंहारों और फासीवादी सैन्यवाद (Militarism) का जन्म हुआ, जिसने अंततः जापान को द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) की अंधकारमय खाई में धकेल दिया। इस विस्तृत लेख में हम इस प्राकृतिक प्रलय, उसके बाद के सामाजिक पतन और राजनीतिक कट्टरपंथ (Radicalization) का गहरा अकादमिक विश्लेषण करेंगे।

ताइशो लोकतंत्र (Taisho Democracy) और भूकंप से पहले का जापान

1923 की त्रासदी के सामाजिक प्रभाव को समझने के लिए, हमें उस समय के जापानी समाज की मानसिकता को समझना होगा। 1910 और 1920 के दशक के जापान को ‘ताइशो लोकतंत्र’ (Taisho Democracy) का युग कहा जाता है।

यह वह समय था जब जापान में अभूतपूर्व आर्थिक विकास हो रहा था और पश्चिमीकरण (Westernization) अपने चरम पर था।

  • टोक्यो की सड़कों पर पश्चिमी कपड़े पहने हुए ‘मोगस’ (Modern Girls) और ‘मोबोस’ (Modern Boys) का चलन था।

  • जापानी समाज में सिनेमा, जैज़ संगीत (Jazz music), कैफे संस्कृति और व्यक्तिवाद (Individualism) तेजी से बढ़ रहा था।

  • राजनीतिक रूप से, वामपंथी विचारधाराओं (समाजवाद, साम्यवाद और अराजकतावाद) का प्रभाव मजदूर वर्ग और बुद्धिजीवियों के बीच तेजी से फैल रहा था।

जापान के पारंपरिक, रूढ़िवादी और सैन्य नेताओं को यह आधुनिकता और पश्चिमी संस्कृति एक ‘नैतिक पतन’ (Moral decay) की तरह लगती थी। उनका मानना था कि जापान अपनी प्राचीन समुराई (Samurai) जड़ों और सम्राट (Emperor) के प्रति अपनी भक्ति को भूल रहा है। और ठीक इसी वैचारिक तनाव के बीच, प्रकृति ने अपना सबसे भयानक प्रहार किया।

1 सितंबर 1923: जब धरती फटी और आसमान से आग बरसी

1 सितंबर 1923 की सुबह टोक्यो और योकोहामा में एक सामान्य दिन की तरह शुरू हुई थी। लेकिन दिन के ठीक 11:58 बजे, जब अधिकांश लोग दोपहर का भोजन (Lunch) बना रहे थे, सागामी खाड़ी (Sagami Bay) के नीचे की टेक्टोनिक प्लेटों में भयंकर टकराहट हुई।

भूकंप की भयावहता: यह भूकंप 7.9 तीव्रता (Magnitude) का था। झटके इतने शक्तिशाली थे कि वे लगातार 4 से 10 मिनट तक महसूस किए गए। पारंपरिक लकड़ी और कागज से बने जापानी घर ताश के पत्तों की तरह ढहने लगे। योकोहामा का बंदरगाह लगभग पूरी तरह से नष्ट हो गया और पानी में समा गया।

अग्नि-प्रलय (The Firestorms): भूकंप से होने वाला नुकसान तो केवल एक शुरुआत थी; असली मौत का तांडव आग ने मचाया। चूँकि भूकंप ठीक दोपहर के भोजन के समय आया था, इसलिए जापानी घरों में भोजन पकाने के लिए पारंपरिक कोयले और लकड़ी के चूल्हे (Kamado) जल रहे थे। भूकंप के झटकों से ये चूल्हे गिर गए और लकड़ी के घरों ने तुरंत आग पकड़ ली। दुर्भाग्य से, उसी समय जापान के तट के पास एक प्रशांत ‘टाइफून’ (Typhoon) गुजर रहा था। इस टाइफून की तेज हवाओं ने छोटी-छोटी आग की लपटों को एक विशाल ‘फायरस्टॉर्म’ (Firestorm) में बदल दिया।

  • अग्नि-बवंडर (Fire Whirls): अत्यधिक गर्मी और तेज हवाओं ने आग के बवंडर (Fire tornadoes) पैदा कर दिए, जो इमारतों और इंसानों को अपने अंदर खींच लेते थे। सबसे दर्दनाक घटना ‘रिकुगुन हिफुकुशो’ (Rikugun Hifukusho) नामक एक पूर्व सैन्य वस्त्र डिपो के खुले मैदान में हुई। आग से बचने के लिए लगभग 40,000 लोगों ने इस खुले मैदान में शरण ली थी। लेकिन एक 300 फीट ऊंचा ‘अग्नि-बवंडर’ इस मैदान के बीच से गुजरा और केवल कुछ ही मिनटों में 38,000 लोग जिंदा जलकर राख हो गए।

इस प्रलय में टोक्यो का 45% हिस्सा और योकोहामा का 90% हिस्सा जलकर खाक हो गया। पानी की मुख्य पाइपलाइनें टूट चुकी थीं, इसलिए फायर ब्रिगेड के पास आग बुझाने का कोई साधन नहीं था। आग लगातार दो दिनों तक जलती रही।

सामाजिक पतन: अफवाहें और ‘कोरियाई नरसंहार’ (The Kanto Massacre)

जब किसी शहर का बुनियादी ढांचा, संचार और पुलिस व्यवस्था पूरी तरह ढह जाती है, तो मानव मनोविज्ञान अक्सर अपने सबसे अंधकारमय और आदिम रूप (Primal state) में लौट आता है। कांटो भूकंप के बाद ठीक ऐसा ही हुआ। यह इस त्रासदी का सबसे कलंकित अध्याय है।

जैसे ही आग शांत हुई और संचार व्यवस्था ठप हो गई, टोक्यो की खण्डहर सड़कों पर भयानक और निराधार अफवाहें (Rumors) फैलने लगीं।

  • अफवाह उड़ी कि यह भूकंप कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि जापान में रहने वाले जातीय कोरियाई (Ethnic Koreans) लोगों ने बम धमाके किए हैं।

  • यह भी झूठ फैलाया गया कि कोरियाई लोग कुओं में जहर मिला रहे हैं, लूटपाट कर रहे हैं और जापानी महिलाओं का बलात्कार कर रहे हैं। (उस समय कोरिया जापान का एक शोषित उपनिवेश था, और कई कोरियाई नागरिक जापान में सस्ते मजदूर के रूप में काम कर रहे थे)।

जिगेदान (Jikeidan) और कत्लेआम: इन अफवाहों को हवा देने में पुलिस और गृह मंत्रालय के कुछ अधिकारियों का भी हाथ था। आत्मरक्षा के नाम पर, जापानी नागरिकों ने ‘जिगेदान’ (Jikeidan – सतर्कता समितियां / Vigilante groups) बना लीं। इन समूहों ने तलवारों, बांस के भाले, लोहे की छड़ों और बंदूकों से खुद को लैस कर लिया।

जापानी सेना द्वारा ‘मार्शल लॉ’ (Martial Law) लागू किए जाने के बावजूद, सड़कों पर कोरियाई लोगों को चुन-चुन कर मारा जाने लगा।

  • लोगों की पहचान करने के लिए ‘शिबोलेथ’ (Shibboleth) का उपयोग किया गया। जापानी लोग संदिग्धों को “जुगो-एन, गोजु-सेन” (15 येन, 50 सेन) या “गागिगुगेगो” जैसे जापानी शब्द बोलने के लिए कहते थे। चूँकि कोरियाई लोगों का उच्चारण (Accent) अलग होता था, इसलिए जो भी सही उच्चारण नहीं कर पाता, उसे वहीं सड़क पर काट दिया जाता था।

  • इस अंधाधुंध नफरत में कई चीनी नागरिकों और क्षेत्रीय जापानी लोगों (जिनकी बोली टोक्यो से अलग थी) को भी कोरियाई समझकर मार दिया गया।

आधुनिक ऐतिहासिक शोधकर्ताओं के अनुसार, इस क्रूर कांटो नरसंहार (Kanto Massacre) में लगभग 6,000 से अधिक निर्दोष कोरियाई और चीनी नागरिकों की पीट-पीट कर या जलाकर हत्या कर दी गई थी। जापानी सरकार ने बाद में इस कत्लेआम को दबाने की कोशिश की, और आज भी जापानी दक्षिणपंथी (Right-wing) समूह इस नरसंहार को नकारने का प्रयास करते हैं।

राजनीतिक कट्टरपंथ: वामपंथियों का सफाया (The Amakasu Incident)

भूकंप की इस अफरातफरी और मार्शल लॉ का फायदा जापानी सरकार और सैन्य अधिकारियों ने अपने राजनीतिक विरोधियों (Political Dissidents) का सफाया करने के लिए भी उठाया।

जापान का रूढ़िवादी कुलीन वर्ग और सेना, वामपंथी विचारधाराओं (समाजवादियों और अराजकतावादियों) से घृणा करती थी। उन्होंने भूकंप की आड़ में इनका शिकार करना शुरू किया।

  • अमाकासु घटना (The Amakasu Incident): 16 सितंबर 1923 को, मिलिट्री पुलिस के कैप्टन अमाकासु मासाहिको ने जापान के सबसे प्रसिद्ध अराजकतावादी (Anarchist) विचारक ओसुगी साकाए (Osugi Sakae), उनकी साथी इतो नोए (Ito Noe), और उनके 6 वर्षीय भतीजे को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस हिरासत में इन तीनों की बेरहमी से हत्या कर दी गई और उनके शवों को एक कुएं में फेंक दिया गया।

  • कामेइडो घटना (The Kameido Incident): इसी तरह, टोक्यो के कामेइडो पुलिस स्टेशन में 10 से अधिक प्रमुख मजदूर संघ के नेताओं और समाजवादियों को सेना द्वारा चुपचाप मार दिया गया।

इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि जापानी राज्य व्यवस्था अब किसी भी प्रकार के राजनीतिक विरोध को बर्दाश्त नहीं करेगी। वामपंथी आंदोलनों को बेरहमी से कुचल दिया गया।

वैचारिक परिवर्तन: “ईश्वरीय दंड” (Divine Punishment) और सैन्यवाद का उदय

1923 का कांटो भूकंप केवल भौतिक विनाश नहीं था; यह जापानी मनोविज्ञान (Psychology) के लिए एक गहरा वैचारिक झटका था।

जापान के पारंपरिक नेताओं, सैन्य जनरलों और दक्षिणपंथी विचारकों ने इस भूकंप की व्याख्या एक ‘टेन्केन’ (Tenken – ईश्वरीय दंड या Heaven’s Punishment) के रूप में की। उन्होंने प्रचारित किया कि: “यह भूकंप इसलिए आया क्योंकि जापानी समाज ताइशो लोकतंत्र के तहत भ्रष्ट, लालची और अत्यधिक पश्चिमीकृत (Westernized) हो गया था। यह प्रकृति की चेतावनी है कि जापान को वापस अपनी पारंपरिक समुराई संस्कृति, अनुशासन और सम्राट के प्रति पूर्ण निष्ठा की ओर लौटना चाहिए।”

इस विचार ने जापानी जनता के बीच गहरी पैठ बना ली। लोग लोकतंत्र और पश्चिमी व्यक्तिवाद (Individualism) से निराश होने लगे।

  • पुनर्निर्माण और सत्ता का केंद्रीकरण: टोक्यो का पुनर्निर्माण (Reconstruction) गोतो शिनपेई (Goto Shinpei) के नेतृत्व में किया गया। लेकिन यह पुनर्निर्माण एक लोकतांत्रिक शहर के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘शाही राजधानी’ (Imperial Capital) के रूप में किया गया, जिसमें चौड़ी सड़कें और सैन्य परेड के लिए बड़े मैदान बनाए गए।

  • फासीवाद की ओर कदम: भूकंप के बाद लागू किए गए कड़े ‘शांति संरक्षण कानून’ (Peace Preservation Law of 1925) ने सरकार को किसी भी ‘खतरनाक विचार’ को कुचलने की असीमित शक्ति दे दी।

इस प्रकार, 1923 के भूकंप ने उस उदारवादी और लोकतांत्रिक ‘ताइशो युग’ का अंत कर दिया और 1930 के दशक के उस उग्र राष्ट्रवादी, सत्तावादी (Authoritarian) और विस्तारवादी (Expansionist) जापान की नींव तैयार की, जिसने मंचूरिया पर आक्रमण किया और अंततः प्रशांत महासागर में द्वितीय विश्व युद्ध (WWII) की आग भड़काई।


1923 का ‘ग्रेट कांटो भूकंप’ केवल विवर्तनिक प्लेटों के टकराने की घटना नहीं थी, बल्कि यह 20वीं सदी के जापान के लिए एक मनोवैज्ञानिक और वैचारिक ‘शॉक थेरेपी’ थी। इस महाविनाश और उसके बाद हुई क्रूरताओं ने जापानी समाज में फैले उदारवाद को हमेशा के लिए दफन कर दिया और एक ऐसे कठोर, सैन्यवादी और अंध-राष्ट्रवादी राज्य का मार्ग प्रशस्त किया जिसने आने वाले दशकों में पूरे एशिया को युद्ध की विभीषिका में धकेल दिया

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