The 1956 Suez Crisis That Officially Marked the Decline of the British Empire

विश्व इतिहास में साम्राज्यों का पतन हमेशा किसी विनाशकारी विश्व युद्ध या भयंकर रक्तपात के साथ नहीं होता। कई बार एक अकेली कूटनीतिक भूल, एक गलत भू-राजनीतिक निर्णय और बदलती हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था किसी भी महाशक्ति के ताबूत में आखिरी कील ठोक सकती है। 1956 का ‘स्वेज संकट’ (The Suez Crisis)—जिसे अरब जगत में ‘त्रिपक्षीय आक्रमण’ (Tripartite Aggression) कहा जाता है—एक ऐसी ही युग-परिवर्तक घटना थी।

यह वह क्षण था जब उस ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ (British Empire) को, जिसके बारे में कभी कहा जाता था कि वहाँ “सूरज कभी अस्त नहीं होता”, अपनी सैन्य और कूटनीतिक सीमाओं का नंगा सच देखना पड़ा। इस संकट ने न केवल मध्य पूर्व (Middle East) की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया, बल्कि दुनिया को यह स्पष्ट संदेश भी दे दिया कि यूरोपीय साम्राज्यवाद (European Imperialism) का युग अब समाप्त हो चुका है और अब यह दुनिया केवल दो नई महाशक्तियों—संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और सोवियत संघ (USSR)—द्वारा संचालित होगी।

राजनीति विज्ञान, अंतरराष्ट्रीय संबंधों (International Relations) और इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए स्वेज संकट ‘पावर पॉलिटिक्स’ (Power Politics) और ‘आर्थिक कूटनीति’ (Economic Diplomacy) का सबसे बेहतरीन उदाहरण है। इस विस्तृत लेख में हम समझेंगे कि कैसे एक नहर पर नियंत्रण की लड़ाई ने ब्रिटेन और फ्रांस के वैश्विक प्रभुत्व को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया।

स्वेज नहर: ब्रिटिश साम्राज्य की ‘जीवन रेखा’ (Lifeline of the Empire)

स्वेज संकट की जड़ों को समझने के लिए स्वेज नहर (Suez Canal) के सामरिक और आर्थिक महत्व को समझना आवश्यक है। 1869 में फ्रांसीसी इंजीनियर फर्डिनेंड डी लेसेप्स (Ferdinand de Lesseps) द्वारा निर्मित यह 120 मील लंबी कृत्रिम नहर भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) को लाल सागर (Red Sea) से जोड़ती थी।

इस नहर के निर्माण ने यूरोप और एशिया (विशेषकर भारत) के बीच की समुद्री दूरी को हजारों मील कम कर दिया था, क्योंकि अब जहाजों को पूरे अफ्रीका (केप ऑफ गुड होप) का चक्कर नहीं लगाना पड़ता था। 1875 में, ब्रिटेन ने आर्थिक संकट से जूझ रहे मिस्र के शासक से ‘स्वेज कैनाल कंपनी’ के 44% शेयर खरीद लिए थे। 20वीं सदी के मध्य तक आते-आते, यह नहर ब्रिटेन के लिए केवल एक व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि साम्राज्य की ‘जुगुलर वेन’ (Jugular Vein – गले की नस) बन चुकी थी। 1950 के दशक तक, पश्चिमी यूरोप को मिलने वाले मध्य पूर्वी तेल (Oil) का दो-तिहाई हिस्सा इसी नहर से होकर गुजरता था। ब्रिटेन का मानना था कि स्वेज नहर पर उनका नियंत्रण उनके राष्ट्रीय अस्तित्व और वैश्विक महाशक्ति बने रहने के लिए अनिवार्य है।

गमाल अब्दुल नासर का उदय और अरब राष्ट्रवाद

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की दुनिया बदल रही थी। उपनिवेशवाद विरोधी (Anti-colonial) भावनाएं उफान पर थीं। मिस्र (Egypt) में, 1952 में ‘फ्री ऑफिसर्स मूवमेंट’ ने एक रक्तहीन तख्तापलट में ब्रिटिश-समर्थक किंग फारुक को उखाड़ फेंका। इसके बाद एक बेहद करिश्माई, महत्वाकांक्षी और कट्टर अरब राष्ट्रवादी नेता का उदय हुआ—गमाल अब्दुल नासर (Gamal Abdel Nasser)

नासर का सपना मिस्र का आधुनिकीकरण करना और पूरे अरब जगत को पश्चिमी साम्राज्यवाद के चंगुल से मुक्त कराना था (जिसे ‘पैन-अरबवाद’ या Pan-Arabism कहा गया)। नासर की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा नील नदी पर ‘अस्वान हाई डैम’ (Aswan High Dam) बनाने की थी, जो मिस्र की कृषि और बिजली की जरूरतों को पूरा कर सके।

इस विशाल बाँध के निर्माण के लिए नासर को भारी वित्तीय सहायता की आवश्यकता थी। शुरुआत में अमेरिका और ब्रिटेन ने इस परियोजना के लिए ऋण देने का वादा किया। लेकिन नासर शीत युद्ध (Cold War) की कूटनीति का चतुराई से उपयोग कर रहे थे। उन्होंने सोवियत संघ के सहयोगी चेकोस्लोवाकिया से हथियार खरीद लिए और कम्युनिस्ट चीन (PRC) को आधिकारिक मान्यता दे दी। नासर के इस सोवियत झुकाव से क्रोधित होकर, जुलाई 1956 में अमेरिका और ब्रिटेन ने अस्वान बाँध के लिए अपना सारा आर्थिक प्रस्ताव (Funding) अचानक वापस ले लिया। यह नासर के लिए एक सीधा राष्ट्रीय अपमान था।

26 जुलाई 1956: ऐतिहासिक पलटवार और नहर का ‘राष्ट्रीयकरण’

नासर कोई ऐसे नेता नहीं थे जो अपमान का घूंट चुपचाप पी लें। उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरी पश्चिमी दुनिया को स्तब्ध कर दिया।

26 जुलाई 1956 को अलेक्जेंड्रिया (Alexandria) में हजारों लोगों की भीड़ के सामने भाषण देते हुए, नासर ने एक गुप्त ‘कोड वर्ड’ बोला: “फर्डिनेंड डी लेसेप्स” (Ferdinand de Lesseps)। यह कोड सुनते ही, मिस्र के सैनिकों और इंजीनियरों ने स्वेज नहर के कार्यालयों पर कब्ज़ा कर लिया।

नासर ने दुनिया के सामने घोषणा कर दी कि स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण (Nationalization) कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि अब नहर से होने वाली सारी आय का उपयोग अस्वान बाँध के निर्माण में किया जाएगा और स्वेज कैनाल कंपनी के विदेशी शेयरधारकों को बाजार मूल्य पर मुआवजा दिया जाएगा। कानूनी तौर पर नासर का कदम बिल्कुल सही था, क्योंकि कंपनी मिस्र के कानून के तहत पंजीकृत थी, लेकिन राजनीतिक रूप से यह पश्चिमी शक्तियों के चेहरे पर एक करारा तमाचा था।

ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधान मंत्री एंथनी ईडन (Anthony Eden) इस खबर से आगबबूला हो गए। ईडन ने 1930 के दशक में एडॉल्फ हिटलर और मुसोलिनी की ‘तुष्टिकरण’ (Appeasement) की नीति का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने नासर की तुलना हिटलर से की और घोषणा की कि यदि नासर को अभी नहीं रोका गया, तो ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी और मध्य पूर्व से उसका प्रभाव हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

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‘सेव्रेस का गुप्त प्रोटोकॉल’ (The Secret Protocol of Sèvres): एक षड्यंत्र का जन्म

चूँकि नासर ने अंतरराष्ट्रीय कानून का कोई सीधा उल्लंघन नहीं किया था, इसलिए ब्रिटेन और फ्रांस (जो मिस्र द्वारा अल्जीरियाई विद्रोहियों के समर्थन से नाराज था) के पास मिस्र पर हमला करने का कोई कानूनी बहाना (Casus Belli) नहीं था।

इसलिए, अक्टूबर 1956 के अंत में, पेरिस के बाहर सेव्रेस (Sèvres) नामक स्थान पर ब्रिटेन, फ्रांस और इज़रायल (Israel) के शीर्ष अधिकारियों के बीच एक अत्यंत गुप्त और विवादास्पद बैठक हुई। यहाँ इतिहास के सबसे कुख्यात भू-राजनीतिक षड्यंत्रों में से एक रचा गया।

योजना यह थी:

  1. इज़रायल पहले मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप (Sinai Peninsula) पर तेजी से हमला करेगा और स्वेज नहर की ओर बढ़ेगा। (इज़रायल को मिस्र द्वारा सीमा पार से होने वाले फिदायीन हमलों को रोकना था और अक़ाबा की खाड़ी तक अपनी पहुंच बनानी थी)।

  2. इस युद्ध के शुरू होते ही, ब्रिटेन और फ्रांस दुनिया के सामने ‘शांतिदूत’ (Peacekeepers) का नाटक करेंगे।

  3. वे मिस्र और इज़रायल दोनों को स्वेज नहर से 10 मील पीछे हटने का अल्टीमेटम देंगे।

  4. चूँकि स्वेज नहर मिस्र के क्षेत्र में थी, इसलिए मिस्र स्वाभाविक रूप से इस अल्टीमेटम को खारिज कर देगा।

  5. मिस्र के इनकार को बहाना बनाकर, ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाएं “नहर की सुरक्षा” के नाम पर मिस्र पर बमबारी करेंगी, नहर पर कब्ज़ा कर लेंगी और नासर की सरकार को उखाड़ फेंकेंगी।

आक्रमण और कूटनीतिक प्रलय: 29 अक्टूबर 1956

योजना के अनुसार, 29 अक्टूबर 1956 को इज़रायली सेना ने ‘ऑपरेशन कदेश’ (Operation Kadesh) के तहत सिनाई पर हमला कर दिया और मिस्र की सेना को बुरी तरह खदेड़ दिया।

इसके अगले ही दिन ब्रिटेन और फ्रांस ने अपना ढोंगी अल्टीमेटम जारी किया और जब नासर ने इसे ठुकरा दिया, तो 31 अक्टूबर को एंग्लो-फ्रांसीसी सेनाओं ने ‘ऑपरेशन मस्किटियर’ (Operation Musketeer) शुरू कर दिया।

ब्रिटिश और फ्रांसीसी युद्धक विमानों ने मिस्र के हवाई अड्डों पर भयंकर बमबारी करके उसकी वायुसेना को जमीन पर ही नष्ट कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश और फ्रांसीसी पैराट्रूपर्स (Paratroopers) पोर्ट सईद (Port Said) पर उतरे और नहर के उत्तरी हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया। सैन्य दृष्टि से, यह अभियान सफल था; नासर की सेना हार रही थी।

लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस ने 20वीं सदी की कूटनीतिक वास्तविकताओं को पूरी तरह से गलत आंका था। वे भूल गए थे कि अब दुनिया का संचालन लंदन या पेरिस से नहीं, बल्कि वाशिंगटन और मॉस्को से होता है।

महाशक्तियों का क्रोध: जब अमेरिका और सोवियत संघ एक साथ आए

स्वेज पर हमले ने वैश्विक स्तर पर एक ऐसा राजनीतिक भूचाल ला दिया जिसकी उम्मीद एंथनी ईडन ने सपने में भी नहीं की थी। इस संकट में शीत युद्ध के दो सबसे बड़े दुश्मन—अमेरिका और सोवियत संघ—मिस्र के पक्ष में और ब्रिटेन/फ्रांस के खिलाफ एक साथ खड़े हो गए।

1. सोवियत संघ की परमाणु धमकी (Khrushchev’s Nuclear Threat)

सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव (Nikita Khrushchev) इस समय हंगरी में हो रहे सोवियत-विरोधी विद्रोह को कुचलने में व्यस्त थे। स्वेज हमले ने दुनिया का ध्यान हंगरी से हटा दिया, लेकिन ख्रुश्चेव ने अरब जगत में अपनी पैठ मजबूत करने का यह मौका नहीं छोड़ा। उन्होंने पेरिस और लंदन को सीधे तौर पर धमकी दी कि यदि उन्होंने तुरंत अपनी सेनाएं वापस नहीं बुलाईं, तो सोवियत संघ उन पर परमाणु मिसाइलों (Nuclear Missiles) से हमला कर देगा और मिस्र की मदद के लिए अपने सैनिक भेजेगा।

2. ड्वाइट डी. आइजनहावर का आर्थिक प्रहार (Eisenhower’s Economic Warfare)

लेकिन ब्रिटेन को सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक झटका अपने सबसे करीबी सहयोगी—संयुक्त राज्य अमेरिका—से लगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर (Dwight D. Eisenhower) इस हमले से आगबबूला थे। इसके दो कारण थे: पहला, अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव सिर पर थे और आइजनहावर ‘शांति के उम्मीदवार’ के रूप में चुनाव लड़ रहे थे। दूसरा, उन्हें डर था कि यदि पश्चिमी देश अरब दुनिया में ऐसा खुला साम्राज्यवाद दिखाएंगे, तो पूरा मध्य पूर्व सोवियत संघ के खेमे में चला जाएगा।

आइजनहावर ने सैन्य धमकी नहीं दी; उन्होंने एक कहीं अधिक घातक हथियार का इस्तेमाल किया—आर्थिक युद्ध (Economic Warfare)

  • युद्ध के कारण नासर ने स्वेज नहर में कबाड़ जहाज डुबोकर उसे ब्लॉक कर दिया था, जिससे यूरोप को तेल की आपूर्ति बंद हो गई थी। अमेरिका ने ब्रिटेन को आपातकालीन तेल देने से साफ इनकार कर दिया।

  • इससे भी बड़ा कदम उठाते हुए, अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) को आदेश दिया कि वह ब्रिटेन को कोई भी आपातकालीन ऋण (Loan) न दे।

  • आइजनहावर प्रशासन ने धमकी दी कि वह अमेरिका के पास मौजूद ‘ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग’ (Pound Sterling) के सारे भंडार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच देगा। यदि अमेरिका ऐसा करता, तो ब्रिटिश मुद्रा पूरी तरह से क्रैश हो जाती और ब्रिटेन रातों-रात दिवालिया हो जाता।

 

जब नदियों ने निगल लिया पूरा देश

 

अपमानजनक वापसी और एंथनी ईडन का पतन

आर्थिक बर्बादी के इस भयानक डर के सामने ब्रिटिश साम्राज्य के घुटने टिक गए। यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटेन अब बिना अमेरिका की अनुमति और समर्थन के अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए युद्ध नहीं लड़ सकता।

भारी दबाव में आकर, 6 नवंबर 1956 को एंथनी ईडन ने युद्धविराम (Ceasefire) की घोषणा कर दी। फ्रांस को भी अनिच्छा से पीछे हटना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) ने एक प्रस्ताव पारित किया और कनाडाई राजनयिक लेस्टर बी. पियर्सन (Lester B. Pearson) के सुझाव पर इतिहास में पहली बार ‘संयुक्त राष्ट्र आपातकालीन बल’ (UNEF – United Nations Emergency Force) नामक एक अंतरराष्ट्रीय शांति सेना (Peacekeepers) का गठन किया गया, जिसे नहर की सुरक्षा के लिए मिस्र भेजा गया।

यह ब्रिटेन और फ्रांस के लिए इतिहास का सबसे बड़ा कूटनीतिक अपमान था। वे बिना अपने किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किए वापस लौट आए। इस शर्मिंदगी और तनाव के कारण जनवरी 1957 में एंथनी ईडन ने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए प्रधान मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

ऐतिहासिक परिणाम: नई विश्व व्यवस्था (New World Order) का जन्म

स्वेज संकट के परिणाम अत्यंत दूरगामी और स्थायी थे:

  1. ब्रिटिश और फ्रांसीसी साम्राज्यों का आधिकारिक अंत: 1956 ने यह निर्विवाद रूप से साबित कर दिया कि ब्रिटेन और फ्रांस अब प्रथम श्रेणी की महाशक्तियां नहीं रहे। इसके बाद ब्रिटेन ने तेजी से अपने अफ्रीकी और एशियाई उपनिवेशों को आजाद करना शुरू कर दिया (Macmillan’s “Wind of Change”)।

  2. फ्रांस की कूटनीतिक दिशा में बदलाव: फ्रांस ने महसूस किया कि वह अमेरिका और ब्रिटेन पर भरोसा नहीं कर सकता। इसके परिणामस्वरूप, चार्ल्स डी गॉल (Charles de Gaulle) के नेतृत्व में फ्रांस ने अपनी स्वतंत्र परमाणु नीति विकसित की, यूरोपीय एकीकरण (European Union के पूर्वज) पर जोर दिया और बाद में नाटो (NATO) की सैन्य कमान से खुद को अलग कर लिया।

  3. गमाल अब्दुल नासर की अपार लोकप्रियता: सैन्य रूप से हारने के बावजूद, नासर पूरे अरब जगत में एक ‘महानायक’ (Hero) के रूप में उभरे। उन्होंने साबित कर दिया कि एक विकासशील देश भी दो पूर्व-उपनिवेशवादी महाशक्तियों को हरा सकता है। पैन-अरब राष्ट्रवाद अपने चरम पर पहुँच गया।

  4. मध्य पूर्व में शीत युद्ध: ब्रिटेन के हटते ही, मध्य पूर्व में एक शक्ति शून्य (Power Vacuum) पैदा हो गया, जिसे भरने के लिए अमेरिका (Eisenhower Doctrine के माध्यम से) और सोवियत संघ तुरंत आगे आए। इसके बाद से मध्य पूर्व शीत युद्ध का सबसे सक्रिय अखाड़ा बन गया।


1956 का स्वेज संकट केवल एक सैन्य अभियान की विफलता नहीं थी, बल्कि यह इस बात की वैश्विक घोषणा थी कि यूरोपीय साम्राज्यवाद का युग हमेशा के लिए समाप्त हो चुका है। इस घटना ने साबित कर दिया कि अब दुनिया की कमान वाशिंगटन और मॉस्को के हाथों में है, और बिना उनकी सहमति के कोई भी पुरानी ताकत अपनी मनमानी नहीं कर सकती

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