The Catastrophic 79 AD Mount Vesuvius Eruption That Froze Pompeii in Ash and Time
पुरातत्व विज्ञान (Archaeology) और प्राचीन इतिहास के अध्ययन में शायद ही कोई अन्य स्थान इतना रहस्यमय, दुखद और वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण हो, जितना कि इटली का प्राचीन रोमन शहर ‘पोम्पेई’ (Pompeii)। यह शहर न तो किसी युद्ध में नष्ट हुआ, न ही किसी महामारी का शिकार हुआ, और न ही समय के साथ धीरे-धीरे वीरान हुआ। इसके विपरीत, पोम्पेई और उसके पड़ोसी शहरों को प्रकृति ने केवल 24 घंटे के भीतर एक खौफनाक मौत दी और फिर उन्हें ज्वालामुखी की राख के नीचे सदियों के लिए सुरक्षित ‘फ्रीज़’ (Freeze) कर दिया।
79 ईस्वी (79 AD) में माउंट वेसुवियस (Mount Vesuvius) का महाविस्फोट केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं था; यह एक ऐसा ‘टाइम कैप्सूल’ (Time Capsule) बन गया जिसने आधुनिक दुनिया को पहली शताब्दी के रोमन साम्राज्य की जीवनशैली, संस्कृति, वास्तुकला और मानवीय भावनाओं को उनके सबसे वास्तविक और अछूते रूप में देखने का अवसर दिया।
इतिहासकारों, भूवैज्ञानिकों (Geologists) और मानवविज्ञानियों के लिए पोम्पेई का विनाश इस बात का एक उत्कृष्ट और खौफनाक उदाहरण है कि जब कोई सभ्यता अपनी ही धरती के नीचे छिपे खतरों से पूरी तरह अनजान होती है, तो उसका अंत कितना प्रलयंकारी हो सकता है। इस लेख में हम वेसुवियस के विस्फोट के भूवैज्ञानिक कारणों, प्रलय की क्रमिक घटनाओं, प्लिनी (Pliny) के ऐतिहासिक वृत्तांतों और उन वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का गहरा अकादमिक विश्लेषण करेंगे जिन्होंने इस शहर को हमेशा के लिए समय में जमा दिया।
प्रलय से पहले का पोम्पेई: रोमन साम्राज्य का विलासितापूर्ण केंद्र
विस्फोट से पहले, पोम्पेई कोई साधारण शहर नहीं था। नेपल्स की खाड़ी (Bay of Naples) के तट पर स्थित यह शहर रोमन साम्राज्य के सबसे धनी और कुलीन लोगों के लिए एक प्रमुख ‘रिसॉर्ट टाउन’ (Resort Town) और व्यापारिक केंद्र था। यहाँ की आबादी लगभग 12,000 से 20,000 के बीच थी।
यह शहर अपनी भव्यता और जीवनंतता के लिए जाना जाता था। यहाँ बड़े-बड़े एम्फीथिएटर (Amphitheaters) थे जहाँ ग्लेडिएटर (Gladiator) युद्ध होते थे। सड़कों पर बेकरियां (Bakeries), सार्वजनिक स्नानागार (Thermal Baths), और ‘लुपानार’ (Lupanar – वेश्यालय) मौजूद थे। पोम्पेई मुख्य रूप से जैतून के तेल, शराब और ‘गारम’ (Garum – एक अत्यधिक महंगी किण्वित मछली की चटनी) के उत्पादन और निर्यात के लिए पूरे रोमन साम्राज्य में प्रसिद्ध था। पास ही में ‘हर्क्यूलेनियम’ (Herculaneum) नामक एक और शहर था, जो पोम्पेई से भी अधिक धनी और कुलीन था, जहाँ रोमन सीनेटरों के विशाल विला (Villas) स्थित थे।
इन रोमन नागरिकों के लिए जीवन बेहद आरामदायक था। लेकिन वे इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि जिस पहाड़ (वेसुवियस) की ढलानों पर उनके अंगूर के बाग लहलहा रहे हैं, वह कोई साधारण पहाड़ नहीं, बल्कि एक सक्रिय स्ट्रैटोवोलकैनो (Stratovolcano) है।
वास्तव में, प्रथम शताब्दी के रोमनों के शब्दकोश में “ज्वालामुखी” (Volcano) जैसा कोई शब्द ही नहीं था। (यह शब्द बाद में ‘वल्कन’ देवता और ‘वल्केनो’ द्वीप के नाम से उत्पन्न हुआ)। उन्होंने वेसुवियस को हमेशा एक शांत और हरे-भरे पहाड़ के रूप में ही देखा था। यहाँ तक कि 73 ईसा पूर्व में प्रसिद्ध विद्रोही ग्लेडिएटर स्पार्टाकस (Spartacus) ने अपनी सेना के साथ इसी पहाड़ के ‘काल्डेरा’ (Caldera – क्रेटर) में रोमन सेना से छिपने के लिए शरण ली थी, क्योंकि तब वह पूरी तरह से जंगलों से ढका हुआ था।
चेतावनी के संकेत: 62 ईस्वी का भूकंप और प्रकृति के अलार्म
प्रकृति हमेशा बिना चेतावनी के हमला नहीं करती। 79 ईस्वी के महाविस्फोट से 17 साल पहले, 62 ईस्वी में, पोम्पेई और आसपास के क्षेत्रों में एक भयंकर भूकंप आया था। इस भूकंप ने शहर के कई मंदिरों, एक्वाडक्ट्स (जलसेतुओं) और सार्वजनिक भवनों को भारी नुकसान पहुँचाया था।
आधुनिक भूवैज्ञानिक अब जानते हैं कि वह भूकंप कोई साधारण टेक्टोनिक गतिविधि नहीं थी, बल्कि वह वेसुवियस के नीचे मैग्मा चैंबर (Magma Chamber) के भरने और ऊपर की ओर उठने का संकेत था। जब गर्म मैग्मा ने पहाड़ के नीचे चट्टानों को तोड़ना शुरू किया, तो उससे भारी भूकंपीय झटके उत्पन्न हुए।
पोम्पेई के निवासियों ने इस भूकंप को एक सामान्य घटना माना और वे अपने शहर का पुनर्निर्माण करने लगे। 79 ईस्वी के अगस्त (या संभवतः अक्टूबर) महीने की शुरुआत में, प्रकृति ने फिर से चेतावनी देनी शुरू की:
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शहर के कुएं और जलस्रोत अचानक सूख गए (क्योंकि जमीन के नीचे का पानी अत्यधिक गर्मी के कारण भाप बन गया था)।
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हवा में सल्फर (गंधक) की तीखी गंध आने लगी।
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लगातार छोटे-छोटे झटके महसूस किए जाने लगे।
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समुद्र में अप्रत्याशित लहरें उठने लगीं और जानवर बेचैन हो गए।
लेकिन भूविज्ञान के ज्ञान के अभाव में, पोम्पेई के निवासियों ने इन सभी संकेतों को नजरअंदाज कर दिया और अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रहे।
विस्फोट का पहला चरण: ‘प्लिनियम’ अवस्था (The Plinian Phase)
इतिहासकारों और भूवैज्ञानिकों के बीच विस्फोट की सटीक तारीख को लेकर एक लंबी बहस रही है। पारंपरिक रूप से इसे 24 अगस्त माना जाता था, लेकिन आधुनिक पुरातात्विक खोजों (जैसे सर्दियों के कपड़े पहने शव, और अनार व अखरोट जैसे शरद ऋतु के फलों का मिलना) ने अब यह लगभग सिद्ध कर दिया है कि यह विस्फोट 24 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 79 ईस्वी के बीच हुआ था।
दोपहर के करीब 1:00 बजे, वेसुवियस का शीर्ष एक गगनभेदी धमाके के साथ फट पड़ा। सदियों से जमे हुए मैग्मा ने पहाड़ के मुहाने (Plug) को उड़ा दिया।
इस घटना का एकमात्र जीवित ऐतिहासिक वृत्तांत प्लिनी द यंगर (Pliny the Younger) द्वारा लिखा गया था, जो उस समय खाड़ी के दूसरी ओर मिसेनम (Misenum) में मौजूद था। प्लिनी ने रोमन इतिहासकार टैसिटस (Tacitus) को लिखे अपने पत्रों में इस बादल का वर्णन एक विशाल ‘अम्ब्रेला पाइन ट्री’ (Umbrella Pine tree – छतरीनुमा देवदार के पेड़) के रूप में किया था, जिसका एक लंबा तना था और ऊपर जाकर वह शाखाओं की तरह फैल गया था।
प्लिनी का यह वर्णन इतना सटीक था कि आज भी आधुनिक ज्वालामुखी विज्ञान (Volcanology) में इस प्रकार के उच्च तीव्रता वाले विस्फोटों को ‘प्लिनियम इरप्शन’ (Plinian Eruption) कहा जाता है।
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प्यूमिस और राख की बारिश: यह राख का स्तंभ वायुमंडल (समताप मंडल) में लगभग 15 से 30 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुँच गया था। जैसे ही मैग्मा हवा के संपर्क में आया, वह तुरंत ठंडा होकर छिद्रयुक्त पत्थरों (जिन्हें ‘प्यूमिस’ या ‘लपिली’ कहा जाता है) में बदल गया।
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हवा का रुख पोम्पेई की ओर था। शहर पर लाखों टन प्यूमिस और राख की बारिश होने लगी। सूरज पूरी तरह से छिप गया और दिन के समय ही भयंकर अंधकार छा गया।
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पोम्पेई में प्यूमिस और राख लगभग 15 सेंटीमीटर प्रति घंटे की दर से जमा हो रही थी। लोग अपने सिर पर तकिए बांधकर भागने लगे। जो लोग अपने घरों के अंदर छिपे रहे, वे जल्द ही फंस गए क्योंकि राख के भार से छतों ने गिरना शुरू कर दिया।
मौत का दूसरा चरण: पायरोक्लास्टिक सर्ज (The Pyroclastic Surges)
रात भर राख और पत्थरों की बारिश होती रही। लेकिन असली हत्यारा अगले दिन की सुबह आया।
वेसुवियस के ऊपर जो विशाल राख और गैस का स्तंभ (Column) खड़ा था, वह अब अपने ही वजन को नहीं संभाल सका और ढह गया। इस पतन ने ज्वालामुखीय विस्फोट की सबसे घातक घटना को जन्म दिया, जिसे ‘पायरोक्लास्टिक फ्लो’ (Pyroclastic Flows/Surges) कहा जाता है।
यह 500°C से 700°C (लगभग 1300°F) गर्म जहरीली गैसों, राख और चट्टानों का एक भयंकर बवंडर था, जो पहाड़ की ढलानों से 700 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से नीचे गिरा। कोई भी इंसान या घोड़ा इस आंधी से तेज नहीं भाग सकता था।
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हर्क्यूलेनियम (Herculaneum) का विनाश: हर्क्यूलेनियम पोम्पेई से अधिक करीब था, इसलिए वह सबसे पहले पायरोक्लास्टिक सर्ज का शिकार हुआ। यहाँ के लोगों ने समुद्र तट पर बने ‘बोटहाउस’ (Boathouses) में शरण ली थी। जब यह 500°C की गर्म आंधी वहाँ पहुँची, तो वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि लोगों की मृत्यु तात्कालिक थी। अत्यधिक गर्मी के कारण उनके शरीर का सारा तरल पदार्थ पलक झपकते ही उबल गया, उनकी खोपड़ियां (Skulls) दबाव के कारण फट गईं, और उनके दांत कांच (Glass) में बदल गए।
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पोम्पेई का अंत: अगली सुबह तक, पोम्पेई में एक के बाद एक कई पायरोक्लास्टिक सर्ज आए। जिन लोगों ने पहले दिन शहर नहीं छोड़ा था, वे अब इस जहरीली गैस (हाइड्रोजन सल्फाइड और सल्फर डाइऑक्साइड) में दम घुटने (Asphyxiation) से या अत्यधिक गर्मी (Thermal shock) से मारे गए। उनका शरीर वहीं राख की परतों के नीचे दफन हो गया।
प्लिनी द एल्डर (Pliny the Elder) का पहला नौसैनिक बचाव अभियान
इस प्रलय के बीच मानव इतिहास का संभवतः पहला दर्ज नौसैनिक बचाव अभियान (Naval Rescue Mission) भी चलाया गया। प्लिनी द यंगर के चाचा, प्लिनी द एल्डर, जो मिसेनम में रोमन नौसेना के कमांडर थे और एक महान वैज्ञानिक व दार्शनिक भी थे, ने लोगों को बचाने का प्रयास किया।
जब उन्हें अपनी मित्र ‘रेक्टिना’ (Rectina) का संदेश मिला कि वे वेसुवियस की तलहटी में फंस गई हैं, तो प्लिनी द एल्डर ने रोमन युद्धपोतों (Quadriremes) को लॉन्च करने का आदेश दिया और खुद खाड़ी के पार स्टेबिए (Stabiae) की ओर निकल पड़े। भयंकर समुद्री तूफानों और गिरते पत्थरों के बावजूद वे तट तक पहुँचे, लेकिन खराब मौसम के कारण वापस नहीं लौट सके। अगले दिन, जहरीली गैसों के संपर्क में आने के कारण प्लिनी द एल्डर की मृत्यु हो गई। उनका यह बलिदान प्राचीन विश्व के वैज्ञानिक साहस का एक अमर प्रतीक बन गया।
राख में जमी सभ्यता: ‘फियोरेली की तकनीक’ और आधुनिक पुरातात्विक खोज
विस्फोट के बाद, पोम्पेई और हर्क्यूलेनियम लगभग 4 से 6 मीटर (13 से 20 फीट) मोटी ज्वालामुखीय राख और प्यूमिस के नीचे हमेशा के लिए दब गए। सदियों तक दुनिया इन शहरों को भूल गई, जब तक कि 1599 में और फिर 1748 में एक नहर खोदते समय इन्हें गलती से दोबारा नहीं खोज लिया गया।
इन शहरों की खोज ने पूरे यूरोप को चकित कर दिया। राख ने एक ‘डेसिकेंट’ (Desiccant – नमी सोखने वाले पदार्थ) और एक ‘हर्मेटिक सील’ (हवा बंद करने वाली परत) का काम किया था। हवा और नमी की कमी के कारण, पोम्पेई में सब कुछ वैसे ही संरक्षित (Preserved) था जैसे वह 79 ईस्वी के उस भयानक दिन था।
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बेकरियों के ओवन में रोटियां (Bread) सिक रही थीं।
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दीवारों पर लिखे गए भित्तिचित्र (Graffiti), चुनावी नारे और कलाकृतियां बिल्कुल ताज़ा थीं।
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घरों में रखे हुए मोज़ेक (Mosaics) और पेंटिंग वैसी ही चमकदार थीं।
द प्लास्टर कास्ट्स (The Plaster Casts): 1860 के दशक में इतालवी पुरातत्वविद् ग्यूसेप फियोरेली (Giuseppe Fiorelli) ने एक যুগान्तकारी (Epoch-making) खोज की। खुदाई के दौरान उन्होंने देखा कि राख के भीतर कई जगह खाली स्थान (Voids) थे जिनमें मानव हड्डियां थीं। फियोरेली समझ गए कि जब मृतकों के शरीर राख में दब गए, तो मांस समय के साथ सड़ गया, लेकिन राख ने उस शरीर के आकार का एक कठोर ढांचा (Mold) बना लिया था।
फियोरेली ने इन खाली स्थानों में तरल प्लास्टर ऑफ पेरिस (Plaster of Paris) डालना शुरू किया। जब राख को हटाया गया, तो उन रोमन नागरिकों की हूबहू आकृतियां सामने आ गईं—उनके मरने का तरीका, उनके चेहरे के भाव, और यहाँ तक कि उनके कपड़ों की सिलवटें भी। एक जगह एक मां अपने बच्चे को गले लगाए हुए थी, और एक जगह एक कुत्ता अपनी जंजीर से बंधा हुआ तड़प रहा था। इन ‘प्लास्टर कास्ट्स’ ने पोम्पेई को केवल एक खण्डहर नहीं, बल्कि एक गहरी मानवीय और भावुक त्रासदी बना दिया।
79 ईस्वी का माउंट वेसुवियस का महाविस्फोट भूवैज्ञानिक इतिहास की वह प्रलयंकारी घटना थी जिसने अपनी अंधाधुंध क्रूरता से हजारों जानें लीं, लेकिन अनजाने में ही पूरी रोमन सभ्यता को राख के आवरण में लपेटकर समय के प्रवाह से बचा लिया। आज पोम्पेई के खंडहर और वहाँ से प्राप्त अवशेष हमें यह याद दिलाते हैं कि मानव निर्मित साम्राज्य और उनकी विलासिता, प्रकृति की असीमित और अप्रत्याशित शक्ति के सामने कितने तुच्छ और क्षणभंगुर हैं