The Massive Mount Tambora Eruption That Caused the Global Year Without a Summer in 1816
पृथ्वी का जलवायु तंत्र (Climate System) एक बेहद जटिल और नाजुक संतुलन पर टिका है। मानव इतिहास में कई बार प्राकृतिक आपदाओं ने इस संतुलन को इतनी बुरी तरह से बिगाड़ा है कि पूरी मानव सभ्यता भुखमरी, अकाल और महामारियों के कगार पर पहुँच गई। जलवायु इतिहास और भूविज्ञान (Geology) के अध्ययन में वर्ष 1815 और 1816 का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और खौफनाक स्थान है।
अप्रैल 1815 में, इंडोनेशिया के सुंबावा (Sumbawa) द्वीप पर स्थित माउंट तंबोरा (Mount Tambora) ज्वालामुखी में एक ऐसा महाविस्फोट हुआ, जिसे पिछले 10,000 वर्षों के ज्ञात मानव इतिहास का सबसे शक्तिशाली ज्वालामुखी विस्फोट माना जाता है। इस विस्फोट ने न केवल एक पूरे द्वीप को श्मशान में बदल दिया, बल्कि इसने पृथ्वी के वायुमंडल में इतनी अधिक मात्रा में सल्फर और राख फेंक दी कि पूरी दुनिया की जलवायु का चक्र ही बदल गया। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1816 को वैश्विक इतिहास में “बिना गर्मियों वाला वर्ष” (The Year Without a Summer) के नाम से जाना जाता है।
यह लेख केवल एक भूवैज्ञानिक घटना का विवरण नहीं है, बल्कि यह इस बात का अकादमिक और वैज्ञानिक विश्लेषण है कि कैसे एक ज्वालामुखी के फटने से उत्तरी अमेरिका में जून के महीने में बर्फबारी हुई, यूरोप में भयंकर अकाल पड़ा, और एशिया में हैजा (Cholera) जैसी वैश्विक महामारी का जन्म हुआ।
तंबोरा का महाविस्फोट: प्रलय के वे तीन दिन
माउंट तंबोरा 1815 से पहले लगभग 4,300 मीटर (14,100 फीट) ऊँचा एक शांत और सुंदर पर्वत था। इसके आसपास घने जंगल थे और तलहटी में ‘संगार’ (Sanggar) नामक एक समृद्ध स्थानीय सभ्यता निवास करती थी। लेकिन इस शांत पर्वत के नीचे सदियों से मैग्मा (Magma) और गैसों का भारी दबाव बन रहा था।
5 अप्रैल 1815 को, पर्वत से पहली बार धुएं का गुबार और आग की लपटें उठीं। इसकी आवाज़ इतनी तेज थी कि 1,400 किलोमीटर दूर स्थित जावा और मालुकु द्वीपों के लोगों को लगा कि कहीं तोपों से भारी गोलाबारी हो रही है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने समुद्री डाकुओं के हमले की आशंका में अपनी सेनाएं भी तैयार कर ली थीं।
लेकिन असली प्रलय 10 और 11 अप्रैल 1815 की मध्यरात्रि को आई।
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विस्फोट की तीव्रता: इस महाविस्फोट को ‘ज्वालामुखीय विस्फोटक सूचकांक’ (Volcanic Explosivity Index – VEI) पर 7 का दर्जा दिया गया है। ऊर्जा के संदर्भ में, यह 1883 के प्रसिद्ध क्राकाटोआ (Krakatoa) विस्फोट से चार गुना अधिक और 79 ईस्वी के माउंट वेसुवियस (जिसने पोम्पेई को नष्ट किया था) से लगभग 100 गुना अधिक शक्तिशाली था।
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पहाड़ का सिर धड़ से अलग होना: विस्फोट इतना भयंकर था कि माउंट तंबोरा का ऊपरी 1,400 मीटर का हिस्सा पूरी तरह से उड़ गया। पहाड़ की ऊँचाई 4,300 मीटर से घटकर 2,850 मीटर रह गई और वहाँ एक 6 किलोमीटर चौड़ा ‘काल्डेरा’ (Caldera – गड्ढा) बन गया।
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तात्कालिक विनाश: 10,000 से अधिक लोग तुरंत 1000°C से अधिक गर्म ‘पायरोक्लास्टिक फ्लो’ (Pyroclastic flow – गर्म गैस और राख की आंधी) में जलकर राख हो गए। सुंबावा द्वीप की पूरी संगार सभ्यता एक ही रात में पृथ्वी के नक्शे से मिट गई। सूनामी की लहरों और उसके बाद फैले अकाल के कारण इंडोनेशियाई द्वीपसमूह में लगभग 71,000 से 1,00,000 लोगों की मृत्यु हुई।
ज्वालामुखीय शीतकालीन का विज्ञान (The Science of Volcanic Winter)
तंबोरा के विस्फोट का असली प्रभाव लावा या राख नहीं था; असली हत्यारा अदृश्य गैसें थीं। जलवायु विज्ञान (Climatology) हमें बताता है कि पृथ्वी की जलवायु में वैश्विक गिरावट (Cooling) तभी आती है जब ज्वालामुखी की गैसें वायुमंडल की ऊपरी परत—समताप मंडल (Stratosphere)—तक पहुँचने में सफल होती हैं।
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सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) का इंजेक्शन: तंबोरा के महाविस्फोट ने लगभग 5 करोड़ से 10 करोड़ टन सल्फर डाइऑक्साइड गैस को 40 किलोमीटर से अधिक की ऊँचाई तक (समताप मंडल में) धकेल दिया।
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सल्फेट एयरोसोल का निर्माण: समताप मंडल में हवाएं बहुत स्थिर होती हैं और वहाँ बारिश नहीं होती (जो गैसों को धो सके)। जब सल्फर डाइऑक्साइड गैस वहाँ मौजूद पानी के वाष्प के साथ प्रतिक्रिया करती है, तो वह ‘सल्फ्यूरिक एसिड’ की सूक्ष्म बूंदों (Sulfate Aerosols) में बदल जाती है।
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अल्बेडो प्रभाव (Albedo Effect): तंबोरा द्वारा बनाए गए इन सल्फेट एयरोसोल्स ने पूरी पृथ्वी के वायुमंडल पर एक ‘दर्पण’ (Mirror) या चादर का काम किया। जब सूर्य की किरणें पृथ्वी की ओर आती थीं, तो ये एयरोसोल उन्हें वापस अंतरिक्ष में परावर्तित (Reflect) कर देते थे।
सौर विकिरण (Solar Radiation) के इस भारी नुकसान के कारण, पृथ्वी के औसत वैश्विक तापमान में 0.4°C से 0.7°C (0.7°F से 1.3°F) की अचानक गिरावट आ गई। एक डिग्री के इस अंश ने दुनिया भर के मौसम चक्र को पंगु बना दिया।
1816: ‘बिना गर्मियों वाला वर्ष’ (The Year Without a Summer)
1815 के अंत तक, समताप मंडल में मौजूद वह सल्फेट की चादर पूरी पृथ्वी पर फैल चुकी थी। 1816 के वसंत और गर्मियों के महीनों में, जब उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में सूरज की तपिश और गर्मी होनी चाहिए थी, तब वहाँ रहस्यमयी धुंध, पाला और बर्फबारी छा गई। इस अचानक हुए जलवायु परिवर्तन ने तीन प्रमुख महाद्वीपों को तबाह कर दिया
1. उत्तरी अमेरिका: “अठारह सौ और मौत की ठंड” (Eighteen Hundred and Froze to Death)
उत्तरी अमेरिका के न्यू इंग्लैंड (New England) और कनाडा के पूर्वी हिस्सों में 1816 का मौसम एक डरावने सपने जैसा था।
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मई के महीने में जब किसानों ने मक्का और गेहूँ बोया, तो अचानक पाला (Frost) पड़ गया।
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6 जून 1816 को, न्यूयॉर्क और मेन (Maine) राज्यों में भारी बर्फबारी हुई। नदियों पर बर्फ जम गई और पक्षी ठंड से मरकर पेड़ों से नीचे गिरने लगे।
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जुलाई और अगस्त के महीनों में भी तापमान अचानक जमाव बिंदु (Freezing point) से नीचे चला जाता था। इस भयंकर ठंड ने अमेरिका की पूरी कृषि व्यवस्था को नष्ट कर दिया।
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ऐतिहासिक जनसांख्यिकीय बदलाव: इस लगातार होने वाले ‘फसल विफलता’ (Crop failure) के कारण अमेरिका के पूर्वी तट पर भुखमरी फैल गई। हताश होकर, हजारों किसान परिवारों ने अपना घर छोड़ दिया और बेहतर मौसम व उपजाऊ जमीन की तलाश में पश्चिमी अमेरिका (विशेषकर ओहायो और इलिनोइस) की ओर पलायन (Migration) करना शुरू कर दिया। तंबोरा ने अनजाने में अमेरिकी ‘पश्चिम की ओर विस्तार’ (Westward Expansion) को तेज कर दिया था।
2. यूरोप: अकाल, दंगे और साहित्य का जन्म
यूरोप पहले से ही नेपोलियन के युद्धों (Napoleonic Wars, 1803-1815) की तबाही से उबरने की कोशिश कर रहा था। 1816 की जलवायु आपदा ने यूरोप को 19वीं सदी के सबसे भयंकर अकाल में धकेल दिया।
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महीनों तक काले बादल छाए रहे और लगातार ठंडी बारिश होती रही। जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और आयरलैंड में गेहूँ, जई और आलू की फसलें पानी में सड़ गईं।
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रोटी की कीमतें आसमान छूने लगीं। भूख से बेहाल लोगों ने शहरों में ‘रोटी के लिए दंगे’ (Food Riots) शुरू कर दिए। लोग जंगलों में घास, काई और बिल्लियां खाने को मजबूर हो गए।
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साइकिल (Bicycle) का आविष्कार: एक बेहद रोचक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि घोड़ों को खिलाने के लिए जई (Oats) नहीं बची थी, जिसके कारण लाखों घोड़े भूखे मर गए। परिवहन के इस संकट को हल करने के लिए, जर्मन आविष्कारक कार्ल ड्रैस (Karl Drais) ने 1817 में लकड़ी की पहली ‘रनिंग मशीन’ (Laufmaschine) का आविष्कार किया, जिसे आज हम ‘साइकिल’ के रूप में जानते हैं।
साहित्य पर प्रभाव: 1816 की गर्मियों में, प्रसिद्ध अंग्रेजी कवियों का एक समूह (जिसमें लॉर्ड बायरन, पर्सी शेली और उनकी 18 वर्षीय प्रेमिका मैरी गॉडविन शामिल थीं) स्विट्जरलैंड में छुट्टियां मनाने गया था। लगातार होती ठंडी बारिश और उदास मौसम के कारण वे कई हफ्तों तक घर के अंदर ही कैद रहे। समय बिताने के लिए उन्होंने डरावनी कहानियाँ लिखने की प्रतियोगिता की। इसी उदास और घुटन भरे मौसम से प्रेरित होकर मैरी (जो बाद में मैरी शेली बनीं) ने इतिहास का सबसे प्रसिद्ध विज्ञान-कथा उपन्यास “फ्रेंकस्टीन” (Frankenstein) लिखा। लॉर्ड बायरन ने अपनी प्रसिद्ध और निराशाजनक कविता “डार्कनेस” (Darkness) भी इसी मौसम के प्रभाव में लिखी थी, जिसकी पहली ही पंक्ति थी: “मेरा एक सपना था, जो पूरी तरह से सपना नहीं था; चमकीला सूरज बुझ गया था…”
3. एशिया: मानसून का टूटना और महामारियों का जन्म
हम अक्सर यूरोप और अमेरिका के बारे में पढ़ते हैं, लेकिन तंबोरा ने एशियाई जलवायु प्रणाली, विशेषकर ‘मानसून’ (Monsoon) पर जो कहर ढाया, वह सबसे अधिक जानलेवा साबित हुआ।
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भारत में मानसून का विलंब और हैजा (Cholera): सल्फेट एयरोसोल के कारण जमीन और समुद्र के तापमान का अंतर बिगड़ गया, जिससे 1816 में भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून पूरी तरह से बाधित हो गया। पहले भयंकर सूखा पड़ा और उसके बाद बंगाल की खाड़ी के क्षेत्रों में असामान्य और मूसलाधार बेमौसम बारिश हुई। इस भारी जलवायु तनाव (Climate stress) और बाढ़ के कारण बंगाल के जल स्रोतों में पाए जाने वाले ‘विब्रियो कोलेरा’ (Vibrio cholerae) नामक जीवाणु (Bacteria) में उत्परिवर्तन (Mutation) हुआ। इस उत्परिवर्तित जीवाणु ने एक अत्यंत संक्रामक और घातक महामारी का रूप ले लिया। लाखों भारतीय मारे गए और यह बीमारी ब्रिटिश सैनिकों के माध्यम से पूरी दुनिया में फैल गई, जिसे पहली वैश्विक हैजा महामारी (First Cholera Pandemic) कहा जाता है।
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चीन में तबाही: चीन के युन्नान (Yunnan) प्रांत में अत्यधिक ठंड के कारण चावल की फसलें लगातार तीन साल तक नष्ट होती रहीं। अकाल इतना भयंकर था कि चीनी किसान अपनी जान बचाने के लिए सफेद मिट्टी (White clay) खाने लगे और अपने बच्चों को बेचने पर मजबूर हो गए। इस अकाल के बाद, युन्नान के किसानों ने चावल जैसी नाजुक फसल पर निर्भर रहने के बजाय ‘अफीम’ (Opium) की खेती शुरू कर दी, जो ठंडे मौसम में भी जीवित रह सकती थी। इस फैसले ने चीन को अगले कई दशकों तक ‘अफीम युद्धों’ (Opium Wars) के जाल में फंसाए रखा।
आधुनिक जलवायु विज्ञान के लिए चेतावनी
माउंट तंबोरा का विस्फोट और उसके बाद का ‘बिना गर्मियों वाला वर्ष’ आधुनिक जलवायु विज्ञान के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। इसने पहली बार यह सिद्ध किया कि वायुमंडल में एरोसोल या गैसों की एक अतिरिक्त परत पूरी दुनिया के तापमान को कैसे बदल सकती है।
आज के भू-वैज्ञानिक (Geologists) चेतावनी देते हैं कि हालांकि हम तंबोरा जैसे ज्वालामुखी विस्फोटों (VEI 7) को रोक नहीं सकते, लेकिन यह घटना हमें दिखाती है कि वैश्विक कृषि और मानव सभ्यता जलवायु में होने वाले अचानक बदलावों के प्रति कितनी अधिक संवेदनशील (Vulnerable) है। केवल एक डिग्री के तापमान परिवर्तन ने 1816 में दुनिया भर की सरकारों, अर्थव्यवस्थाओं और समाजों को घुटनों पर ला दिया था। वर्तमान समय में, जब मानवीय गतिविधियों (Human-induced Global Warming) के कारण पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है, तंबोरा का इतिहास हमें याद दिलाता है कि जब प्रकृति अपना संतुलन खोती है, तो इसका परिणाम कितना प्रलयंकारी हो सकता है।